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Anaya — Caring free soul
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चित्र: पापमोचनी एकादशी

हिंदू · 2 अप्रैल 2027

पापमोचनी एकादशी

“पाप से मुक्त करने वाली”: वर्ष की अंतिम एकादशी।

🔊 कथा सुनें📜 पूरी व्रत कथा सुनेंकथा पढ़ें ↓

क्यों मनाया जाता है

एकादशी हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को, महीने में दो बार आती है। यह भगवान विष्णु का सबसे प्रचलित व्रत है; साल की 24 एकादशियों (अधिक मास वाले साल में 26) का अपना नाम और अपनी कथा है।

इसके पीछे की कथा

अप्सरा मंजुघोषा ने ऋषि मेधावी की लंबी तपस्या भंग की, और वर्षों बीतने का बोध होने पर ऋषि ने उसे पिशाचिनी होने का शाप दिया। ऋषि च्यवन ने दोनों को पापमोचनी एकादशी करने को कहा — वह शाप से और ऋषि क्रोध के पाप से मुक्त हुए।

कैसे मनाएँ

  • सूर्योदय से व्रत: चावल या अनाज नहीं; फल, दूध और साबूदाना सामान्य हैं
  • तुलसी दल से विष्णु पूजा करें (तुलसी एक दिन पहले तोड़ लें)
  • उस एकादशी की कथा पढ़ें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जपें
  • अगली सुबह पारण समय में व्रत खोलें

व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा — एकादशी देवी का प्राकट्य

🔊 पूरी कथा सुनें

सतयुग में मुर नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। उसने इंद्र सहित सभी देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया। दुखी देवता भगवान शिव के पास गए, और शिव जी ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में जाने को कहा।

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने मुर से युद्ध किया। हज़ारों वर्षों तक युद्ध चलता रहा। मुर के साथी असुर मारे गए, पर मुर हार नहीं मान रहा था। लंबे युद्ध से थककर भगवान विष्णु विश्राम के लिए बद्रिकाश्रम की हेमवती नाम की एक गुफा में जाकर योगनिद्रा में लेट गए।

मुर उनका पीछा करते हुए गुफा में आ पहुँचा। भगवान को सोया देखकर उसने सोचा, “यही अवसर है,” और उन पर वार करने के लिए हथियार उठाया।

तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी, दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित देवी प्रकट हुईं। उन्होंने मुर को युद्ध के लिए ललकारा, और भयंकर युद्ध में उसका वध कर दिया।

जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे और मुर को मरा हुआ देखा, तो वे चकित हुए। देवी ने हाथ जोड़कर सारा वृत्तांत सुनाया। भगवान ने प्रसन्न होकर कहा, “तुम मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। वर माँगो।”

देवी ने कहा, “प्रभु, जो भी मनुष्य मेरे दिन श्रद्धा से उपवास करे, उसके पाप नष्ट हों और उसे आपकी कृपा व मोक्ष मिले।” भगवान ने कहा, “तथास्तु। जो एकादशी का व्रत करेगा, वह मेरा प्रिय होगा, और उसे सब तीर्थों और यज्ञों का फल मिलेगा।”

इसीलिए मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते हैं — एकादशी के जन्म का दिन — और बहुत लोग एकादशी व्रत इसी दिन से शुरू करते हैं। एकादशी पर अन्न, विशेषकर चावल, नहीं खाया जाता; भगवान विष्णु की तुलसी दल से पूजा होती है, रात्रि जागरण होता है, और अगले दिन द्वादशी को शुभ समय में पारण किया जाता है।

हे एकादशी माता, हे भगवान विष्णु, जो भी आपका व्रत करे, उसके जीवन के सब विघ्न दूर करना। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

॥ इति कथा समाप्त ॥

अन्य एकादशियाँ

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पुराणों, महाकाव्यों और लोक परंपरा की कथाएँ, सरल शब्दों में। रीति-रिवाज और तिथियाँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकती हैं — व्रत या संस्कार के लिए अपने परिवार की परंपरा या पुरोहित का पालन करें।

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