
हिंदू · 6 मार्च 2027
महाशिवरात्रि
शिव की महान रात्रि: व्रत, रात भर पूजा और अभिषेक।
क्यों मनाया जाता है
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (अमांत गणना में माघ) को रात भर, ख़ासकर निशीथ काल में, शिव जी की पूजा होती है।
इसके पीछे की कथा
आज की रात कई कथाएँ जुड़ी हैं। इसी रात शिव-पार्वती का विवाह हुआ। शिव ने तांडव किया। ब्रह्मा और विष्णु के “कौन बड़ा” विवाद पर शिव अनंत अग्नि-स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए — न कोई उसका आदि पा सका, न अंत। और समुद्र मंथन में संसार को बचाने के लिए शिव ने हलाहल विष पिया; उनका कंठ नीला हुआ, और देवताओं ने रात भर प्रार्थना करके उन्हें जगाए रखा।
कैसे मनाएँ
- व्रत रखें और रात के चारों प्रहर जागरण करें
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाएँ
- “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें
- किसी ज्योतिर्लिंग या पास के शिव मंदिर जाएँ
व्रत कथा
महाशिवरात्रि व्रत कथा
प्राचीन समय में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। वह जंगल के जानवरों का शिकार करके अपने परिवार का पेट पालता था। वह एक साहूकार का कर्ज़दार था, और समय पर कर्ज़ न चुका पाने पर साहूकार ने उसे एक शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।
मठ में दिन भर शिव पूजा होती रही और शिकारी ने शिवरात्रि की कथा और भजन सुने। शाम को साहूकार ने उसे बुलाकर कर्ज़ के बारे में पूछा। शिकारी ने अगले दिन तक सारा कर्ज़ लौटाने का वचन दिया, और उसे छोड़ दिया गया।
दिन भर भूखा-प्यासा शिकारी शिकार के लिए जंगल गया। रात होने लगी, तो वह एक तालाब के किनारे बेल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, ताकि पानी पीने आने वाले जानवर का शिकार कर सके। उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था, जो बेलपत्रों से ढका था; शिकारी को इसका पता नहीं था।
बैठने की जगह बनाने के लिए उसने बेल की टहनियाँ तोड़ीं, और पत्ते नीचे शिवलिंग पर गिरते गए। उसके पास रखी पानी की मशक से कुछ बूँदें भी शिवलिंग पर गिरीं। इस तरह अनजाने में उसका उपवास भी हुआ, रात्रि का जागरण भी, और शिवलिंग पर जल और बेलपत्र भी चढ़ गए।
रात के पहले प्रहर में एक गर्भवती हिरनी पानी पीने आई। शिकारी ने तीर चढ़ाया, तो हिरनी बोली, “मैं गर्भवती हूँ, जल्द ही बच्चे को जन्म दूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे। मुझे जाने दो, बच्चे को जन्म देकर मैं ख़ुद लौट आऊँगी।” शिकारी ने उसे जाने दिया, और धनुष उतारते समय फिर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। पहले प्रहर की पूजा हो गई।
दूसरे प्रहर में एक और हिरनी आई। उसने कहा, “मैं अभी-अभी ऋतु से निवृत्त हुई हूँ और अपने पति को ढूँढ रही हूँ। उससे मिलकर मैं लौट आऊँगी।” शिकारी ने उसे भी जाने दिया। तीसरे प्रहर में एक हिरनी अपने बच्चों के साथ आई और बोली, “मुझे इन बच्चों को इनके पिता के पास छोड़ आने दो, फिर लौट आऊँगी।” शिकारी का मन पिघल रहा था; उसने उसे भी जाने दिया। हर बार बेलपत्र गिरते रहे।
भोर से पहले एक हष्ट-पुष्ट हिरन आया। उसने कहा, “यदि तुमने मेरी तीनों हिरनियों और बच्चों को मार दिया है, तो मुझे भी मार दो; और यदि उन्हें छोड़ा है, तो मुझे भी कुछ समय दो — मैं उनसे मिलकर लौट आऊँगा।” शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
उपवास, रात्रि जागरण और अनजाने में हुई चारों प्रहर की शिव पूजा से शिकारी का हृदय निर्मल हो गया। थोड़ी देर बाद हिरन अपने पूरे परिवार के साथ वचन निभाने लौट आया। जानवरों की सत्यनिष्ठा और प्रेम देखकर शिकारी की आँखों में आँसू आ गए। उसने धनुष तोड़ दिया और सबको जीवनदान दिया।
उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने शिकारी को आशीर्वाद दिया, और मृत्यु के बाद उसे शिवलोक मिला; वह हिरन परिवार भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। जो कोई शिवरात्रि पर उपवास, जागरण और शिव पूजन करता है, उस पर भोलेनाथ ऐसे ही कृपा करते हैं। बोलो हर हर महादेव!
॥ इति कथा समाप्त ॥
इस कैलेंडर से और
चैत्र नवरात्रि आरंभ · गुड़ी पड़वा · उगादिराम नवमीहनुमान जयंतीअक्षय तृतीयाबुद्ध पूर्णिमाजगन्नाथ रथ यात्रागुरु पूर्णिमाहरियाली तीजनाग पंचमीरक्षा बंधनकृष्ण जन्माष्टमीहरतालिका तीजगणेश चतुर्थीअनंत चतुर्दशीपितृ पक्ष आरंभमहालया अमावस्या (सर्व पितृ)शारदीय नवरात्रि आरंभदुर्गा अष्टमीमहा नवमीदशहरा (विजयादशमी)शरद पूर्णिमाकरवा चौथअहोई अष्टमीधनतेरसनरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)दीपावली (लक्ष्मी पूजा)गोवर्धन पूजाभाई दूजछठ पूजादेवउठनी एकादशीकार्तिक पूर्णिमा · देव दीपावलीविवाह पंचमीगीता जयंतीवसंत पंचमीहोलिका दहनहोलीलोहड़ीमकर संक्रांति · पोंगल · उत्तरायणमेष संक्रांति · बैसाखी · विशुएकादशीप्रदोष व्रतविनायक चतुर्थीसंकष्टी चतुर्थीमासिक शिवरात्रिपूर्णिमाअमावस्यासंक्रांति