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चित्र: हरतालिका तीज

हिंदू · 3 सितंबर 2027

हरतालिका तीज

स्त्रियों का कठोर व्रत — शिव को पाने के लिए पार्वती के तप की याद में।

🔊 कथा सुनें📜 पूरी व्रत कथा सुनेंकथा पढ़ें ↓

क्यों मनाया जाता है

भाद्रपद शुक्ल तृतीया को स्त्रियाँ सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं; कन्याएँ अच्छे वर के लिए।

इसके पीछे की कथा

पार्वती के पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया था। पार्वती केवल शिव से प्रेम करती थीं, इसलिए उनकी सखियाँ उन्हें हर कर (हरत = हरण, आलिका = सखियाँ) वन में ले गईं। वहाँ उन्होंने बालू का शिवलिंग बनाकर पूरी रात व्रत और पूजा की। शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और विवाह के लिए राज़ी हुए — इसलिए नाम पड़ा “हरतालिका”।

कैसे मनाएँ

  • दिन-रात निर्जला व्रत रखें
  • बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती बनाकर पूजा करें
  • रात भर भजन गाते हुए जागरण करें
  • अगली सुबह पूजा के बाद पारण करें

व्रत कथा

हरतालिका तीज व्रत कथा

🔊 पूरी कथा सुनें

एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, “प्रभु, मैंने आपको किस पुण्य से पति रूप में पाया?” तब भगवान शिव ने उन्हें उनके पिछले जन्म की यह कथा सुनाई।

“हे पार्वती, तुमने हिमालय पर्वत के घर जन्म लिया था। बचपन से ही तुम मुझे पति रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए तुमने गंगा के किनारे कठोर तप किया — बारह वर्ष तक केवल धुआँ पीकर, फिर सूखे पत्ते खाकर, फिर केवल वायु पीकर। सर्दी में जल में खड़ी रहीं, गर्मी में पंचाग्नि तपी, वर्षा में खुले आकाश के नीचे बैठी रहीं।”

“तुम्हारी यह दशा देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुखी थे। उसी समय नारद मुनि हिमालय के पास आए और बोले कि भगवान विष्णु तुम्हारी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। हिमालय ने प्रसन्न होकर हाँ कर दी। नारद जी ने यह समाचार विष्णु जी को भी दे दिया।”

“जब तुमने यह सुना तो तुम्हें बहुत दुख हुआ, क्योंकि तुम्हारा मन केवल मुझमें लगा था। तुमने अपनी सखी को अपनी पीड़ा बताई। तब तुम्हारी सखियाँ तुम्हें पिता की नज़र से बचाकर घने जंगल की एक गुफा में ले गईं। सखियों द्वारा हरी गई — इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।”

“उस गुफा में भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन, हस्त नक्षत्र में, तुमने बालू से शिवलिंग बनाया और निर्जला व्रत रखकर पूरी रात जागरण करते हुए मेरी स्तुति की। तुम्हारे इस कठोर तप से मेरा आसन डोल गया। मैं वहाँ प्रकट हुआ और तुमसे वर माँगने को कहा।”

“तुमने कहा, ‘मैंने आपको मन से पति मान लिया है, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे पत्नी रूप में स्वीकार कीजिए।’ मैंने ‘तथास्तु’ कहा और कैलाश लौट आया। अगले दिन तुमने व्रत का पारण किया और पूजन की सामग्री नदी में प्रवाहित कर दी।”

“उधर तुम्हारे पिता तुम्हें ढूँढते हुए उस गुफा तक पहुँचे। तुमने उन्हें सब बताया और कहा कि मैं तभी घर चलूँगी जब आप मेरा विवाह शिव जी से करेंगे। पिता ने तुम्हारी बात मान ली, और विधि-विधान से हमारा विवाह हुआ।”

भगवान शिव ने कहा, “हे देवी, जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से यह व्रत करती है और यह कथा सुनती है, उसका सौभाग्य अटल रहता है, और जो कन्या यह व्रत करती है, उसे मनचाहा वर मिलता है।”

हे माँ पार्वती, जैसे आपको आपका मनचाहा वर मिला, वैसे ही सबकी मनोकामना पूर्ण करना। बोलो उमा-महेश्वर की जय!

॥ इति कथा समाप्त ॥

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पुराणों, महाकाव्यों और लोक परंपरा की कथाएँ, सरल शब्दों में। रीति-रिवाज और तिथियाँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकती हैं — व्रत या संस्कार के लिए अपने परिवार की परंपरा या पुरोहित का पालन करें।

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